होगा गुमान तुझे खुद पर बोहत 'संदीप' तो बना रहे,
एक सुबह तुझको राख में ढूढेंगे ये लोग
और पानी में बहा देंगे,
और कहेंगे कुछ दिन तक आंखों में नमी सी है।
तेरे वजूद की हस्ती भी वैसे बस वहीं तक है,
ये रंगत ये शोहरत जो बटोर रहा है ना तू
जब तक तू ज़िंदा है बस तभी तक है।
तुझे बोहत पड़ी है सपनो को पूरा करने की आज,
फुरसत से तो जैसे, तेरी बोहत पुरानी दुश्मनी सी है।
कुछ लोग ज़िन्दगी से चलें जाएंगे हमेशा के लिए,
बोहत बुरा लगेगा ,और तू पछतायेगा फिर देख लेना
अपनो के लिए भी वक़्त निकाल ,अच्छा लगेगा
ऐसे जीकर तो देख,ज़िन्दगी युंभी बोहत सही सी है।
तेरी गाड़ी तो कबकी मंज़िल की तरफ निकल चुकी है!
वो तो मिल ही जाएगी ,एक दिन कैसे न कैसे ही,
बिछड़ गया ना एक बार, ये सब जो है अभी साथ में,
फिर रोज़ कहेगा खुदसे, ज़िन्दगी हाथों से फिसल रही सी है।
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